......सा है
चाँद अनकहा सा है
खामोशी कहकहा सा है
शोर की है एक जुबां
आँखों से कुछ बहा सा है
नीद गीली गीली सी
धूप ढीली ढीली सी
रात अब चला सा है
शाम कुछ ढला सा है
ज़मी की कमी सी है
भूख अब बला सी है
कोना कोना चुप है
दिल भी कुछ रोया सा है
pti
Subscribe to:
Post Comments (Atom)
1 comment:
APKA BLOG PADHA kafi achha laga... Apki kavitavon mein dum hai..
Abdullah Khan
http://abdullah71.googlepages.com/xyz
Post a Comment