Saturday, March 15, 2008

मां होती तो क्या होता

सोचता हूं
मां होती तो क्या होता
ज़मीं होती आसमां होता
आंचल की छांव घना होता
बेगाने से इस बेरहम शहर में
कोई न कोई अपना होता

सोचता हूं
मां होती तो क्या होता
नहीं कुछ बुरा सब भला होता
सपनों का गांव बसा होता
वीराने से इस तपते शहर में
अपना भी कोई निशां होता

सोचता हूं
मां होती तो क्या होता
जगमग सारा शमां होता

सूरज का घर बना
काले कलूटे बेशरम शहर में
दूश्मन के दिल में वफ़ा होता

सोचता हूं
मां होती तो क्या होता
चुल्हे पर बर्तन चढा होता
दाल रोटी पका होता
तडपते बिलखते भूखे शहर में
शायद ही कोई भूखा होता

सचमुच
मां होती तो क्या होता!